शिमला टाइम, रामपुर बुशहर
किसी के लिए मोमबत्ती महज रोशनी का एक साधन है, लेकिन कोशिश एक आशा स्पेशल स्कूल के विशेष बच्चों के लिए यह आत्मनिर्भर बनने की उम्मीद और अपने हुनर को पहचान दिलाने का माध्यम है। जिन बच्चों के लिए सामान्य पढ़ाई आसान नहीं होती, वे आज अपने नन्हे हाथों से ऐसी खूबसूरत मोमबत्तियां तैयार कर रहे हैं, जो दूसरों के घरों को रोशन करने के साथ उनके जीवन में भी आत्मविश्वास का उजाला भर रही हैं।
विशेष स्कूल के बच्चों ने करीब दो महीने की मेहनत से फूलों, बबल कैंडल, जेली वैक्स, सोया वैक्स और पैराफिन वैक्स से रंग-बिरंगी और आकर्षक डिजाइन वाली मोमबत्तियां तैयार की हैं। बच्चों के हाथों से बने इन उत्पादों की रामपुर बाजार में दुकान भी सजाई गई है, जहां 20 से 250 रुपये तक की कीमत में मोमबत्तियां उपलब्ध हैं। इनकी खरीदारी कर लोग बच्चों की मेहनत को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
स्कूल की शिक्षिका नीलम और एक दिव्यांग बच्चे की अभिभावक कविता बताती हैं कि बच्चों ने पूरी लगन और उत्साह से मोमबत्तियां तैयार की हैं। तैयार उत्पाद देखकर उनके चेहरों पर आने वाली खुशी और आत्मविश्वास ही इस मेहनत का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
हुनर से संवार रहे भविष्य…
स्कूल में बच्चों को उनकी उम्र और सीखने की क्षमता के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां मोमबत्तियां बनाने के साथ राखियां तैयार करना, पत्तल बनाना, खड्डी, सिलाई और बुनाई जैसे काम भी सिखाए जाते हैं। 15 वर्ष से अधिक आयु के करीब 20 बच्चे व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसका उद्देश्य उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार हुनर सिखाकर आत्मनिर्भर बनाना है।
स्कूल की संस्थापक स्वाति बंसल ने वर्ष 2013 में महज दो बच्चों के साथ इस सफर की शुरुआत की थी। आज यहां 40 से अधिक बच्चे शिक्षा और प्रशिक्षण ले रहे हैं। शिमला, चौपाल, रामपुर, किन्नौर और आउटर सिराज से बच्चे यहां आते हैं।
इन बच्चों के लिए अपने हाथों से कोई वस्तु तैयार कर पाना भी किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। उनकी बनाई मोमबत्तियां इस दिवाली सिर्फ घरों को रोशन नहीं करेंगी, बल्कि यह संदेश भी देंगी कि अवसर और प्रोत्साहन मिले तो हर बच्चा अपनी प्रतिभा से अपनी अलग पहचान बना सकता है।









